🌸सुन्दरकांड🌸
"लछिमन वान सरासर आनू।
सोखों बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुन्दर नीती।।
ममता रत सन ज्ञान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामहि हरिकथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
काटेहिं पइ कदरी फरइ
कोटि जतन कोउ सींच।
विनय न मान खगेस सुनु
डाँटेहिं पइ नव नीच।।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
तीन दिन विनती करते बीत गए पर समुद्र पर कोई प्रतिक्रिया वहॉं हुई। अब प्रभु ने कुछ रोष प्रगट किया। लक्षमण जी से धनुष वाण मॉंग कर मंत्र शक्ति के अग्निवाण से समुद्र को सुखाने हेतु उद्धत हुए।
यहॉं प्रभु कुछ नीति की बात बता रहे हैं। जड़ समुद्र का विनय न मानना संकेत है कि जड़ बुद्धि या शठ लोगों से विनय द्वारा कुछ अपेक्षा करना बेकार है। कृपन से संकेत है जो तात्कालिक लाभ देखता हो। "ममता रत" अर्थात जिसकी वुद्धि" यह मेरा वह मेरा" के भाव से लिपटी पड़ी है उसको अध्यात्म की बात कभी सुहाएगी ही नहीं उसका ज्ञान तो मात्र धन अर्जन करने के लिए है। लोभी व्यक्ति से भी वैराग्य की बात करना व्यर्थ है। इसी प्रकार क्रोधी व्यक्ति जो अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है ,वह सबमें परमात्मा का दर्शन कैसे कर सकता है? जिसे सांसारिक उपलब्धि की ही कामना है,जो परमात्मा से धन दौलत औलाद ही चाहता है उसको भगवान की कथा,सुनाने का क्या लाभ होगा ?उसे तो किसी मज़ार पर या साईंबाबा ही सुहाएगा। यह वैदिक सनातन धर्म संसार की उपलब्धि को अधिक वरीयता नहीं देता। व्यक्ति जब तक आत्मभाव की ओर नहीं मुड़ सकता तब तक धर्म की बात करना खोखली बातें हैं।
हाल में राम के नाम पर चल रहे समूह में जिसमें गले में पीला पट्टा डाले माथे पर बडा सा टीका लगाए नेता लोग हैं,हमने यहॉं जोड़ने की अनुमति मॉंगी थी। मात्र एक नाम आया। किसको ठग रहे हो ? यहॉं तो वैसे ही लाखों लोग गुरू बन कर ठगाई कर रहे हैं। पूरा बैण्ड ही बिगड़ जाएगा तो धरा तो अकुलाएगी ही। आदमी कभी नहीं अकुलाया।
कुछ और नीति की बातें भगवान ने कीं। पर समुद्र पर कोई असर नहीं हुआ। आख़िरकार भगवान ने धनुष पर चाप चढ़ा ही लिया। जैसे ही भगवान अग्निवाण का मंत्र बोलने लगे,समुद्र का तापमान बढ़ने लगा। उसके अंदर के जीव जंतु अकुलाने लगे ,ऊपर आने लगे तो अब समुद्र का अधिष्ठात्र देव विप्र के रूप में सोने के थाल में नानाप्रकार की मणि मुक्ता लेकर बाहर प्रभु के सामने आया।भयभीत है सो विप्र बन कर आया क्यों कि विप्र अवद्य है।
विभीषण को प्रभु पहले ही कह चुके हैं
"जौं नर होहि चराचर द्रोही
आवइ सभय सरन तकि मोही।।
........
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।"
जब विनाश दिखाई पड़ा तो समुद्र मान छोड़कर ,परमात्मा के ऐश्वर्य के आगे भयभीत होकर प्रस्तुत हो गया। इसकी भी शरणागति निश्चित हो गई। लौकिक व्यवहार में केले पर फल तो लगता है लेकिन एकबार लगने के बाद जब तक उसे काटा नहीं जाएगा दुबारा फल नहीं आता। उसके बढते अहंकार को छॉंटना पडता है।
यह बात काकभुशुन्डि जी गरुड को बता रहे हैं कि संसार में नीच व्यक्ति से बिना डॉंट फटकार के शुभ कृत्य की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
"लछिमन वान सरासर आनू।
सोखों बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुन्दर नीती।।
ममता रत सन ज्ञान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामहि हरिकथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
काटेहिं पइ कदरी फरइ
कोटि जतन कोउ सींच।
विनय न मान खगेस सुनु
डाँटेहिं पइ नव नीच।।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
तीन दिन विनती करते बीत गए पर समुद्र पर कोई प्रतिक्रिया वहॉं हुई। अब प्रभु ने कुछ रोष प्रगट किया। लक्षमण जी से धनुष वाण मॉंग कर मंत्र शक्ति के अग्निवाण से समुद्र को सुखाने हेतु उद्धत हुए।
यहॉं प्रभु कुछ नीति की बात बता रहे हैं। जड़ समुद्र का विनय न मानना संकेत है कि जड़ बुद्धि या शठ लोगों से विनय द्वारा कुछ अपेक्षा करना बेकार है। कृपन से संकेत है जो तात्कालिक लाभ देखता हो। "ममता रत" अर्थात जिसकी वुद्धि" यह मेरा वह मेरा" के भाव से लिपटी पड़ी है उसको अध्यात्म की बात कभी सुहाएगी ही नहीं उसका ज्ञान तो मात्र धन अर्जन करने के लिए है। लोभी व्यक्ति से भी वैराग्य की बात करना व्यर्थ है। इसी प्रकार क्रोधी व्यक्ति जो अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है ,वह सबमें परमात्मा का दर्शन कैसे कर सकता है? जिसे सांसारिक उपलब्धि की ही कामना है,जो परमात्मा से धन दौलत औलाद ही चाहता है उसको भगवान की कथा,सुनाने का क्या लाभ होगा ?उसे तो किसी मज़ार पर या साईंबाबा ही सुहाएगा। यह वैदिक सनातन धर्म संसार की उपलब्धि को अधिक वरीयता नहीं देता। व्यक्ति जब तक आत्मभाव की ओर नहीं मुड़ सकता तब तक धर्म की बात करना खोखली बातें हैं।
हाल में राम के नाम पर चल रहे समूह में जिसमें गले में पीला पट्टा डाले माथे पर बडा सा टीका लगाए नेता लोग हैं,हमने यहॉं जोड़ने की अनुमति मॉंगी थी। मात्र एक नाम आया। किसको ठग रहे हो ? यहॉं तो वैसे ही लाखों लोग गुरू बन कर ठगाई कर रहे हैं। पूरा बैण्ड ही बिगड़ जाएगा तो धरा तो अकुलाएगी ही। आदमी कभी नहीं अकुलाया।
कुछ और नीति की बातें भगवान ने कीं। पर समुद्र पर कोई असर नहीं हुआ। आख़िरकार भगवान ने धनुष पर चाप चढ़ा ही लिया। जैसे ही भगवान अग्निवाण का मंत्र बोलने लगे,समुद्र का तापमान बढ़ने लगा। उसके अंदर के जीव जंतु अकुलाने लगे ,ऊपर आने लगे तो अब समुद्र का अधिष्ठात्र देव विप्र के रूप में सोने के थाल में नानाप्रकार की मणि मुक्ता लेकर बाहर प्रभु के सामने आया।भयभीत है सो विप्र बन कर आया क्यों कि विप्र अवद्य है।
विभीषण को प्रभु पहले ही कह चुके हैं
"जौं नर होहि चराचर द्रोही
आवइ सभय सरन तकि मोही।।
........
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।"
जब विनाश दिखाई पड़ा तो समुद्र मान छोड़कर ,परमात्मा के ऐश्वर्य के आगे भयभीत होकर प्रस्तुत हो गया। इसकी भी शरणागति निश्चित हो गई। लौकिक व्यवहार में केले पर फल तो लगता है लेकिन एकबार लगने के बाद जब तक उसे काटा नहीं जाएगा दुबारा फल नहीं आता। उसके बढते अहंकार को छॉंटना पडता है।
यह बात काकभुशुन्डि जी गरुड को बता रहे हैं कि संसार में नीच व्यक्ति से बिना डॉंट फटकार के शुभ कृत्य की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
No comments:
Post a Comment